ये कहां आ गए हम यूं हीं बातें बनाते बनाते

हम आईना खुद देखेंगे नहीं। कोई और दिखाएगा तो टीवी चैनलों पर खीझ निकालेंगे। नतीजा सामने है। हम दुनिया के उन 13 खतरनाक देशों में शामिल हो गए हैं जहां जाना रिस्क से भरा है। ये हम नहीं कह रहे हैं। ये कहना है वल्र्ड इकनॉमिक फोरम का। उसने ग्लोबल ट्रैवल एंड […]

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ये कहां आ गए हम यूं हीं बातें बनाते बनाते

हम आईना खुद देखेंगे नहीं। कोई और दिखाएगा तो टीवी चैनलों पर खीझ निकालेंगे। नतीजा सामने है। हम दुनिया के उन 13 खतरनाक देशों में शामिल हो गए हैं जहां जाना रिस्क से भरा है। ये हम नहीं कह रहे हैं। ये कहना है वल्र्ड इकनॉमिक फोरम का। उसने ग्लोबल ट्रैवल एंड टूरिज्म पर हाल ही में जो रिपोर्ट दी है उसमें खतरे के मामले में भारत अपने पड़ोसी पाक से महज 9 कदम पीछे है।

इस रिपोर्ट की कई बातें आंखें खोलने वाली हैं। फिनलैंड, कतर और यूएई जैसे छोटे-छोटे देश ट्रैवल सुरक्षा के मामले में टॉप थ्री में शामिल हैं। दूसरी ओर, सबसे रिस्क वाले 15 देशों में तो भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका तक का नाम नहीं है। सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, सबसे बड़े इकनॉमिक सुधार और लगभग पर बड़े मुल्क से हमारे नेतृत्व के बेहतर संबंध। फिर भी ग्लोबल ट्रैवल एंड टूरिज्म मैप पर हमारी ये हालत।

ये रिपोर्ट हमारी आंख खोलने के लिए काफी है। बुद्ध और गांधी जैसे शांति के मसीहा का देश। जहां चींटी को भी मारना पाप समझा जाता है। जो वसुधैव कुटुम्बकम का पैरोकार है। वह देश दुनिया के लोगों की नजर में खतरनाक कैसे हो गया। वल्र्ड इकनॉमिक फोरम की रिपोर्ट अगर हम पर उंगली उठाती है तो हमें बचने के बहाने नहीं चाहिए। हमें गिरेबान में झांकना होगा। जिन बिंदुओं पर ये रिपोर्ट तैयार हुई है, उन पर हमें अपनी स्थिति सुधारनी होगी। हमें एेसी ग्लोबल रिपोर्ट में अपने को साफ सुथरा दिखाने के लिए हर जतन करना होगा।

इधर रहन-सहन और सुरक्षा को लेकर ग्लोबल एजेंसियों की जो भी रिपोर्ट आई हैं, वे सभी हमारी चिंता बढ़ाती हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भी हम ‘सीरियस’ की श्रेणी में हैं। ट्रैवल सुरक्षा के मामले में ये हाल है। किसान और युवा भी परेशान हैं। एेसे में हमारे नेतृत्व और जिम्मेदार लोगों पर ज्यादा जिम्मेदारी आ गई है। देश की छवि कैसी दिखे, ये आईने को तय करने का मौका न दें। हम आईने में कैसे दिखें ये हम खुद तय करें। हम बेहतर बनेंगे तो हर ग्लोबल इंडेक्स पर हमारी धूम होगी। दुनिया हमारी ओर देखेगी और हम कह सकेंगे, आईए हुजूर आपका स्वागत है।

पहले जगाइए फिर समझाइए समाज को

विश्व तंबाकू निषेध दिवस यानी दुनिया को कैंसर के सबसे बड़े कारक से बचाने का दिन। ये बताने का दिन कि तंबाकू एक ओर जहां घातक बीमारियों की जड़ है। वहीं दूसरी ओर ये नई पीढ़ी को गलत दिशा  में ले जाने का कारण। चाहै खैनी हो, सुरती हो, सिगरेट हो या हुक्का। इनमें से कोई भी न आपको समाज में इज्जत दिलाता है, न सेहत दिलाता है और न ही इससे घर में कोई सुख-शांति है।

तंबाकू का नशा एक फितूर है। जब ये सर पर चढ़कर बोलता है तो डिप्रेशन को जन्म देता है। डिप्रेशन का शिकार आदमी अपराध की ओर कदम बढ़ा देता है। कभी खुद के शरीर को कष्ट देता है और खुदकुशी जैसे कदम उठा लेता है। नशे के लती अक्सर एक जुंग में रहते हैं और चोरी से लेकर महिला उत्पीड़न जैसे घृणित अपराध  में लग जाता है। नशा एक जिंदगी नहीं, पूरा घर बरबाद कर देता है। समाज की उन्नति रोक देता है।

मेरा मानना है कि चाहे तंबाकू हो, नशा हो या कोई और बुराई, उसके खिलाफ लड़ने के लिए पहले समाज को जंगाना पड़ता है। जागृत समाज किसी भी बुराई को घुसने का मौका ही नहीं देता है। बुराई से लड़ने की ताकत खुद पैदा करता है। एेसे समाज को तंबाकू जैसी बुराई से बचने के लिए समझाना आसान होता है। हमें ये बात समझनी होगी कि ना कानून, न हो हल्ला काम आता है। केवल और केवल समाज को जगाने का काम कीजिए, समझाने का काम कीजए। बुराइयां खुद दूर हो जाएंगी।

#worldnotobaccoday #31May

‘मशाल’ बुझाने के बाद अब ‘प्रकाश’ को किया कैद

पाकिस्तान में ईश निंदा का कड़ा कानून है। कानून में कड़ी सजा का प्रावधान है। दोषी को मौत की सजा भी मिल सकती है। लेकिन, दुखद ये है कि पाकिस्तान में ईश निंदा का आरोप अदालतें नहीं तय करतीं। एक भीड़ अचानक से जमा होती है। किसी शख्स पर ईश निंदा का आरोप लगाती है और पीट-पीटकर मार डालने की सजा खुद दे देती है। कानून लागू करने की जिम्मेदार बाद में मौके पर पहुंचते हैं। फिर जांच बैठाई जाती है। ..और कभी किसी मशाल खान की बोलती बंद कर दी जाती है तो कभी प्रकाश को फ्यूज करने की घटना हो जाती है।

बलूचिस्तान के एक कस्बे में हिंदू कारोबारी प्रकाश के साथ जो हुआ, उससे तो प्रशासन के हाथ-पांव फूले हैं। व्हाट्स एप पर ग्रुप बनाकर क्रांति करने वाले सिविल सोसाइटी के लोगों की बोलती बंद है। मीडिया इशारों में प्रकाश और उसके जैसे अल्पसंख्यकों पर ज्यादती को लेकर तो आवाज उठा रही है, पर ईश निंदा के नाम पर हो रहे भीड़ के निर्णयों पर चुप है।

पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता बीना सरवर ने ट्वीट कर दिया तो प्रकाश के साथ हुई घटना दुनिया के सामने आ गई। गुरुवार को लासबेला कस्बे के एक बड़े दुकानदार के बेटे ने अभी दु्कान खोली ही थी। तभी कुछ युवक उसकी दुकान पर अाकर पूछने लगे कि ये व्हाट्स एप नंबर तुम्हारा है। तुमने जो अपने ग्रुप में संदेश भेजा है, वो खुदा की नाफरमानी है। प्रकाश कुछ समझ पाता उससे पहले ही मारो-मारो की आवाजें भीड़ से आने लगीं। इसी बीच, किसी समझदार ने पुलिस को इत्तिला दे दी। पुलिस ने ईश निंदा के आरोप में हिरासत में ले लिया। भीड़ ने थाना घेर लिया। वह प्रकाश को हवाले करने की मांग पर अड़ गई। पुलिस ने प्रकाश को अदालत में पेशकर सीधे सेंट्रल जेल भेज दिया।

अभी कुझ दिन पहले ही 23 साल के मशाल खान को इसी तरह के आरोप में  विश्वविद्यालय में पीटकर मार डाला गया। अब प्रकाश को सजा देने पर भीड़ आमादा है। एेसे में सवाल उठने लगे हैे कि पाक में ईश निंदा का कानून है या भीड़ के हाथों किसी का कत्ल कराने का लाइसेंस। बीना सरवर कहती हैं कि निजी अदावत निपटाने का काम ईश निंदा के नाम पर किया जा रहा है। ये भीड़ तंत्र का कानून बनता जा रहा है। अारोपी पर न मुकदमा चलता है और बचाव का कोई मौका दिया जाता है। अभी तो सभी प्रकाश की सलामती की दुआ करें।

बर्बर समाज में ‘ज्ञान की मशाल’ जलाने की हिम्मत न करिऔ…

रुचि मिश्रा

हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का ये वाक्या आंख खोलने वाला है। मासूम छात्र मशाल खान को जिस तरह मरदान के विश्वविद्यालय कैंपस में दिनदहाड़े हजारों की भीड़ के सामने पीट-पीटकर मार डाला गया, वाे असभ्यता की पराकाष्ठा है। भीड़ का आरोप था कि मशाल खान ने ईश निंदा की है। पूरे वाक्ये में तमाशबीन रही पुलिस का कहना है कि ईश निंदा का कोई मामला दर्ज ही नहीं कराया गया। तो… भीड़ ने आरोप लगाया, सजा सुनाई और उस पर अमल भी खुद ही कर दिया। ‘ज्ञान की मशाल’ जलाने निकले युवा की जिंदगी की मशाल भीड़ ने बुझा दी।

सोशल मीडिया पर मशाल खान के दोस्त और सिविल सोसाइटी के लोग खुलकर आ रहे हैं। उनका कहना है कि मशाल खान तो ज्ञान की मशाल जलाने निकला था। वो खुद को मानवतावादी बताता था। अब्दुल वली खान विश्वविद्यालय में मॉस कम्युनिकेशन का छात्र था। वो साथियों से कहता था कि पत्रकार बनकर समाज से अज्ञानता का अंधियारा मिटाएगा। लोगों के बताएगा कि विज्ञान ही आज आपको, समाज को आगे ले जा सकता है।

पर, वो ये सब बाते गलत जगह पर कर रहा था। एेसे मुल्क में कर रहा था, जहां समाज का बड़ा तबका पोलियो की दवा, जनगणना और एेसे तमाम वैज्ञानिक कामों को धर्म के विरुद्ध बता देता है, जो सरकारें करना चाहती हैं। फिर, मशाल खान तो बच्चा था। उसकी ज्ञान की बातें कौन सुनता। उसके साथ पढ़ने वाले मासूमों को ही भड़काकर मशाल को ईशद्रोही साबित किया गया। विश्वविद्यालय में हथियार पहुंचाए गए और फिर भीड़ का रूप देकर एक वैज्ञानिक सोच का कत्ल कर दिया गया। न पुलिस में मामला दर्ज कराया, न मशाल को उसका दोष बताया, न कानून का पालन। बस भीड़ का फैसला, भीड़ ने लागू कर दिया।

भीड़ तंत्र किसी भी सभ्य समाज के लिए घातक है। जब भीड़ पड़ोसी मुल्क में एेसा करेगी तो हमें बुरा लगेगा। पर, देखते रहिएगा कहीं आप भी तो नहीं किसी एेसी भीड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं। जिस भी समाज में कानून का राज खत्म होकर भीड़ का राज शुरू हो जाएगा, वहां हिंसा और प्रतिहिंसा होना लाजिमी है। आंख खुली रखिए, लोकतंत्र के महापर्व की भीड़ का हिस्सा बनिए। लेकिन, कभी भी एेसी भीड़ में शामिल न होइए जो कानून अपने हाथ में लेती हो।

 

मलाला बनी मिसाल : मंडेला, दलाई लामा सा सम्मान मिल रहा बहादुर पाक लड़की को

आज माता रानी के शक्ति रूप की उपासना का दिन है। एेसा दिन जब बच्चियों को पूजा जाता है, सम्मान दिया जाता है। इस दिन उन बेटियों को याद किया जाता है जिन्होंने समाज में साहस और शक्ति की मिसाल पेश की। मेरी नजर में  शक्ति और साहस की जीवंत मिसाल बन गई है मासूम पाकिस्तानी बच्ची मलाला युसुफजई।

तालिबान के हमले से बचना, फिर आतंकी संगठन को करारा जवाब देते हुए बालिका शिक्षा को अपना मिशन बना लेना। नोबुल पुरस्कार लेते समय का उसका दुनिया को संदेश हो या दुनिया की कोई और समस्या। इस लड़की की राय बेबाक और दिशा देने वालब होती है। कभीःकभी लगता है रिकार्ड उसके पीछे भागते हैै।

मलाला को अब वो सम्मान मिलने जा रहा है जो नेल्सन मंडेला और दलाई लामा जैसी सिर्फ छह हस्तियों को अब तक मिला है। कनाडा की सरकार इस पाक बाला को देश की मानद नागरिकता से नवाजने जा रही है। पीएम जस्टिन आगामी 12 अप्रैल को जब इस शक्तिशाली बिटिया को हॉनरेरी परमानेंट सिटीजनशिप देंगे, तो पूरी दुनिया की आधी आबादी को सम्मान मिल जाएगा।

जो डरते हैं, वो भागते रहते हैं। कभी परिस्थितियों से, कभी खुद के डर से। जो रुक जाते हैं वो जीतते हैं, कभी अशिक्षा से, कभी भूख से कभी तालिबान जैसे खूंखार आतंकी संगठन से। मलाला आज उसी संघर्ष की प्रतीक बन गई है। इसीलिए, अब लोग कहने लगे हैं कि जो जिंदगी को अपने अंदाज से जीते हैं, वो चाहे स्त्री हों या पुरुष, वो मलाला सी मिथक बन सकते हैं।

ट्रांस जेंडर ! दरोगा बनकर समाज को आईना दिखाया याशिनी ने

समाज नई सोच का स्वागत करने को हमेशा तैयार रहता है। बेटियों को उनका हक देने की बात हो या दिव्यांगों के लिए जीने की राह दिखाने की। वैज्ञानिक सोच और मानवीय कल्पना से समाज हमेशा हर तबके को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता है। इसी सोच के साथ अब समाज उस तबके को मुख्य धारा में लाने के लिए आगे आया है जिसे सबसे ज्यादा तिरस्कार सहना पड़ा है।

आज हर जुबान पर के. पृथिका याशिनी का नाम है। ये नाम किन्नर या ट्रांस जेंडर को समाज में सम्मानजनक स्ठान देने का प्रतीक बन गया है।  एक साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद याशिनी ने जब स्टार लगी तमिलनाडु पुलिस की वर्दी पहनी तो सदियों से बदनामी और अपमान का दंश झेल रहे किन्नर समाज या ट्रांस जेंडर को मानो नई जिंदगी मिल गई ट्रांस जेंडर के. पृथिका याशिनी ने तमिलनाडु के धरमपुरी जिले के एसपी आफिस में कानून-व्यवस्था विंग में तैनाती दी गई है।

मुख्य धारा की पुलिसिंग में  ट्रांस जेंडर दरोगा की तैनाती समाज में हो रही मूक क्रांति को दर्शा रही है। तमिलनाडु के सीएम  के. पलनीसामी की मौजूदगी में सब इंस्पेक्टर पृथिका याशिनी ने अपने बड़े सपने को सामने रखकर उस क्रांति का अागाज भी कर दिया है। वह पहली ट्रांस जेंडर आईपीएस बनना चाहती है। मतलब, इंपावरिंग ट्रांस जेंडर की वह ध्वजवाहक बनना चाहती है।

प्रदीप के याशिनी बनने और फिर एक ट्रांस जेंडर के पुलिस में भर्ती होने के लिए उसके संघर्ष की कहानी भी कम रोचक नहीं है। फार्म भरनेे के लिए कोर्ट का चक्कर, फिर भर्ती रेस में शामिल होने के लिए कोर्ट से गुहार आैर तमाम पचड़ों से लड़ते हुए पुलिस की वर्दी  पहनने में सफल होना। याशिनी ने साबित कर दिया किन्नर या ट्रांस जेंडर न संघर्ष में किसी से कम हैं और न ही किसी और बात में। पृथिका याशिनी ने ट्रांस जेंडर की बराबरी की लड़ाई को एक कदम और आगे बढ़ा दिया है। समाज इस बदलाव में आगे बढ़कर मददगार बना तो देश एक नई क्रांति का गवाह बनेगा।