काश! पॉलीथिन के खिलाफ इस अनूठी जंग को मिल जाए आप सबका साथ

उत्तर प्रदेश का शहर लखीमपुर एक शांत किंतु बड़ी क्रांति का आगाज कर चुका है। शांत इसलिए कि इस अनोखे क्रांतिवीर ने न कोई झंडा उठाया है और न डंडा। वो तो दूध लेने निकले, सब्जी लेने बाजार पहुंचे और बच्चों को स्कूल ले जाते अभिभावकों के सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है। हाथ भी आपकी भलाई के लिए जोड़ता है ये क्रांतिवीर। उसका निवेदन होता है- कृपया पॉलीथिन का उपयोग बंद करिए। पर्यावरण, गोमाता के साथ खुद के भविष्य को बचाने के लिए- SAY NO TO POLYTHENE.

अकेले क्रांतिवीर के प्रयास से आ रहा बदलाव

पॉलीथिन के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका है लखीमपुर के बृजेश मिश्र जी ने। बड़े सहज और शांत भाव से वे यज्ञ में लगे हैं। लेकिन, हाथ जोड़कर ‘ निवेदन की इस शांत क्रांति ‘ ने असर दिखाना शुरू कर दिया है। कुछ लोग पॉलीथिन में दूध लाना छोड़ रहे हैं। कुछ लोग पुराने तरीके से झोला या थैला लेकर बाजार सब्जी लेने जाने लगे हैं। असली बात यह है कि अब जब मिश्र जी के हाथ जुड़ते हैं तो कई युवा खुद ही पॉलीथिन को ‘ ना’ का वचन देते हैं।

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बृजेश मिश्र के फेसबुक वॉल से साभार

अनोखा तरीका, सतत प्रयास है कुंजी

बृजेश मिश्र जी की मुहिम बिना शोर-शराबे और अखबारों की सुर्खियां बने चल रही है। जिस संडे को हम सब आराम का दिन मानकर देर तक सोने में व्यस्त होते हैं, उस समय मिश्रजी किसी पॉलीथिन के ढेर को हटाने में लगे होते हैं। वे अपने साथ आए एक-दो युवाओं को लेकर किसी मुहल्ले में घर-घर कुंडी खट-खटाकर या डोरवेल बजाकर पॉलीथिन के दुष्परिणामों से अवगत करा रहे होते हैं।

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बृजेशजी फेसबुकवॉल से साभार

काश, हर शहर में पैदा हों एेसे वीर

मेरा बृजेश मिश्र जी के काम पर ब्लाग लिखने का मन यूं नहीं किया। दरअसल नोएडा और दिल्ली में जब रोज पॉलीथिन के ढेर देखता हूं तो मन उद्वेलित होता है। बारिश में नदी बनती सड़क देखता हूं तो पता चलता है कि पॉलीथिन कितना बड़ा नुकसान पहुंचा रही है। एेसे में जब मिश्रजी की शांत मुहिम सामने आती है तो लगता है उम्मीद की किरण बाकी है। दूसरे शहरों के लोग भी अपने आसपास को पॉलीथिन मुक्त करने के लिए इसी तरह के छोटे-छोटे प्रयास शुरू कर सकें तो बदलाव जरूर आएगा। कोई संडे का क्रातिवीर बन जाए को शनिवार का बली। देखते-देखते पॉलीथिन के खिलाफ लोगों में जागरूकता आएगी और समाज एक नई दिशा में सोचना शुरू कर देगा। वैसे भी ये काम अपने भले के लिए तो है।

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‘मशाल’ बुझाने के बाद अब ‘प्रकाश’ को किया कैद

पाकिस्तान में ईश निंदा का कड़ा कानून है। कानून में कड़ी सजा का प्रावधान है। दोषी को मौत की सजा भी मिल सकती है। लेकिन, दुखद ये है कि पाकिस्तान में ईश निंदा का आरोप अदालतें नहीं तय करतीं। एक भीड़ अचानक से जमा होती है। किसी शख्स पर ईश निंदा का आरोप लगाती है और पीट-पीटकर मार डालने की सजा खुद दे देती है। कानून लागू करने की जिम्मेदार बाद में मौके पर पहुंचते हैं। फिर जांच बैठाई जाती है। ..और कभी किसी मशाल खान की बोलती बंद कर दी जाती है तो कभी प्रकाश को फ्यूज करने की घटना हो जाती है।

बलूचिस्तान के एक कस्बे में हिंदू कारोबारी प्रकाश के साथ जो हुआ, उससे तो प्रशासन के हाथ-पांव फूले हैं। व्हाट्स एप पर ग्रुप बनाकर क्रांति करने वाले सिविल सोसाइटी के लोगों की बोलती बंद है। मीडिया इशारों में प्रकाश और उसके जैसे अल्पसंख्यकों पर ज्यादती को लेकर तो आवाज उठा रही है, पर ईश निंदा के नाम पर हो रहे भीड़ के निर्णयों पर चुप है।

पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता बीना सरवर ने ट्वीट कर दिया तो प्रकाश के साथ हुई घटना दुनिया के सामने आ गई। गुरुवार को लासबेला कस्बे के एक बड़े दुकानदार के बेटे ने अभी दु्कान खोली ही थी। तभी कुछ युवक उसकी दुकान पर अाकर पूछने लगे कि ये व्हाट्स एप नंबर तुम्हारा है। तुमने जो अपने ग्रुप में संदेश भेजा है, वो खुदा की नाफरमानी है। प्रकाश कुछ समझ पाता उससे पहले ही मारो-मारो की आवाजें भीड़ से आने लगीं। इसी बीच, किसी समझदार ने पुलिस को इत्तिला दे दी। पुलिस ने ईश निंदा के आरोप में हिरासत में ले लिया। भीड़ ने थाना घेर लिया। वह प्रकाश को हवाले करने की मांग पर अड़ गई। पुलिस ने प्रकाश को अदालत में पेशकर सीधे सेंट्रल जेल भेज दिया।

अभी कुझ दिन पहले ही 23 साल के मशाल खान को इसी तरह के आरोप में  विश्वविद्यालय में पीटकर मार डाला गया। अब प्रकाश को सजा देने पर भीड़ आमादा है। एेसे में सवाल उठने लगे हैे कि पाक में ईश निंदा का कानून है या भीड़ के हाथों किसी का कत्ल कराने का लाइसेंस। बीना सरवर कहती हैं कि निजी अदावत निपटाने का काम ईश निंदा के नाम पर किया जा रहा है। ये भीड़ तंत्र का कानून बनता जा रहा है। अारोपी पर न मुकदमा चलता है और बचाव का कोई मौका दिया जाता है। अभी तो सभी प्रकाश की सलामती की दुआ करें।

बर्बर समाज में ‘ज्ञान की मशाल’ जलाने की हिम्मत न करिऔ…

रुचि मिश्रा

हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का ये वाक्या आंख खोलने वाला है। मासूम छात्र मशाल खान को जिस तरह मरदान के विश्वविद्यालय कैंपस में दिनदहाड़े हजारों की भीड़ के सामने पीट-पीटकर मार डाला गया, वाे असभ्यता की पराकाष्ठा है। भीड़ का आरोप था कि मशाल खान ने ईश निंदा की है। पूरे वाक्ये में तमाशबीन रही पुलिस का कहना है कि ईश निंदा का कोई मामला दर्ज ही नहीं कराया गया। तो… भीड़ ने आरोप लगाया, सजा सुनाई और उस पर अमल भी खुद ही कर दिया। ‘ज्ञान की मशाल’ जलाने निकले युवा की जिंदगी की मशाल भीड़ ने बुझा दी।

सोशल मीडिया पर मशाल खान के दोस्त और सिविल सोसाइटी के लोग खुलकर आ रहे हैं। उनका कहना है कि मशाल खान तो ज्ञान की मशाल जलाने निकला था। वो खुद को मानवतावादी बताता था। अब्दुल वली खान विश्वविद्यालय में मॉस कम्युनिकेशन का छात्र था। वो साथियों से कहता था कि पत्रकार बनकर समाज से अज्ञानता का अंधियारा मिटाएगा। लोगों के बताएगा कि विज्ञान ही आज आपको, समाज को आगे ले जा सकता है।

पर, वो ये सब बाते गलत जगह पर कर रहा था। एेसे मुल्क में कर रहा था, जहां समाज का बड़ा तबका पोलियो की दवा, जनगणना और एेसे तमाम वैज्ञानिक कामों को धर्म के विरुद्ध बता देता है, जो सरकारें करना चाहती हैं। फिर, मशाल खान तो बच्चा था। उसकी ज्ञान की बातें कौन सुनता। उसके साथ पढ़ने वाले मासूमों को ही भड़काकर मशाल को ईशद्रोही साबित किया गया। विश्वविद्यालय में हथियार पहुंचाए गए और फिर भीड़ का रूप देकर एक वैज्ञानिक सोच का कत्ल कर दिया गया। न पुलिस में मामला दर्ज कराया, न मशाल को उसका दोष बताया, न कानून का पालन। बस भीड़ का फैसला, भीड़ ने लागू कर दिया।

भीड़ तंत्र किसी भी सभ्य समाज के लिए घातक है। जब भीड़ पड़ोसी मुल्क में एेसा करेगी तो हमें बुरा लगेगा। पर, देखते रहिएगा कहीं आप भी तो नहीं किसी एेसी भीड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं। जिस भी समाज में कानून का राज खत्म होकर भीड़ का राज शुरू हो जाएगा, वहां हिंसा और प्रतिहिंसा होना लाजिमी है। आंख खुली रखिए, लोकतंत्र के महापर्व की भीड़ का हिस्सा बनिए। लेकिन, कभी भी एेसी भीड़ में शामिल न होइए जो कानून अपने हाथ में लेती हो।

 

बात पते की : तो क्या संघ भी बड़े बदलाव की ओर चल पड़ा है !

पहले दिल्ली में भाजपा की सरकार। फिर महाराष्ट्र, हरियाणा होते हुए असम और जम्मू-कश्मीर तक भाजपा की सरकार।  अब यूपी, उत्तराखंड, गोवा से मणिपुर तक कमल खिल गया। प्रचारकों की रात-दिन की मेहनत और संघ की कुशल रणनीति कामयाब हुई तो पूर्व प्रचारकों को पीएम से लेकर सीएम तक की जिम्मेदारी दी गई।

हिंदू  मतों के बिखराव को रोकने में संघ और उसके प्रचारक कामयाब रहे। हिंदुत्व की प्रयोगशाला का सफल परीक्षण है जाति प्रथा को छोड़कर हिंदू होने के भाव को आगे बढ़ाना। यूपी के चुनाव में मिली जीत इस प्रयोग की सफलता का बड़ा नमूना है। पर, जो किसी सफलता पर न रुके, नई मंजिल और नए लक्ष्य की ओर बढ़ चले, उस संस्था का नाम है आरएसएस।

इधर कुछ दिनों की गतिविधियों से एेसा प्रतीत हो रहा है कि आरएसएस खुद को भी बदल रहा है। सबसे बड़ा बदलाव आया है ड्रेस मैं। अब स्वयंसेवकों का हॉफ की जगह फुल पैंट पहनना बड़ा बदलाव है। इससे बड़ा बदलाव  है शााखाओं में इंजनियर – डाक्टर  की बढ़ती संख्या। उससे भी बड़ी बात है इन हाइटेक युवाओं के बीच से ही नए नेतृत्व की तलाश। फिर उनको तराशना और फिर राष्ट्र जागरण के काम में लगाना।

तभी तो कोयंबटूर में हुई  आरएसएस कार्यकारिणी की बैठक में यूपी जैसे बड़े राज्य में प्रांत स्तर पर प्रचारकों के कामकाज में भारी बदलाव किया गया। यूपी में कई प्रांत प्रचारकों कार्यक्षेत्र मंगलवार को ही बदल दिए गए हैं। दत्तात्रेय होसबोले जी जैसे युवा पदाधिकारी को बड़ी जिम्मेदारी दी जा रही है। मतलब, संघ भी बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है। नए संकल्प के साथ नई ऊर्जा भी जुटाने का काम शुरू हो गया है। वैसे भी देश के 16 राज्यों में भाजपा की सरकार होने का फायदा तो है ही।

बोले थे ना ! यूपी वालों इतने एमएलए दूंगा कि …

UP CM Race: More Leaders, More Confusion

रुचि मिश्रा:

बड़े-बुजुर्ग कोई बात एेसे ही थोड़े कह गए हैं। एक संत कहे थे…अति का भला ना बरसना, अति की भली न धूप। आज ये कहावत उत्तर प्रदेश में भारी जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी के ऊपर फिट बैठ रही है। कभी 100 विथायकों काे तरसने वाली पार्टी के पास 2017 के चुनाव में बहुमत से 110 विधायक ज्यादा आए हैं। सहयोगी दलों का संख्या बल बोनस में है।

जितना बड़ा बहुमत, उतनी बड़ी जिम्मेदारी। ये बात खुद भाजपा के एकमात्र चेहरा बन चुके माननीय प्रधानमंत्री कह चुके हैं। जिम्मेदारियों की शुरुआत तो विधायकों के शपथ लेने से पहले ही हो चुकी है। चुनौती है इतनी बड़ी संख्या में विधायक चुनकर आई शख्सियतों का नेता यानी सूबे का नया मुख्यमंत्री चुनने की। रोज सुबह एक नाम चलता है, शाम तक या तो वह खुद खंडन कर देता है अथवा टांय-टांय फिस्स हो जाता है।

एेसे में लोगों के जेहन में दबंग वाले सलमान खान की तर्ज पर तरह-तरह के क्रिएटिव आइडिया आ रहे हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया का सहारा ले अपनी पसंद का नाम उछाल रहे हैं तो कुछ अपने क्रिएटिव आइडिया से व्यंग्य पैदा कर रहे हैं। एेसा ही एक  क्रिएटिव आइडिया वायरल है… बोले थे ना ! यूपी वालों इतने एमएलए दूंगा कि तुम तय नहीं कर पाओगे कि नेता इनमें से चुना जाए या बाहरी को लाकर बैठा दिया जाए।

व्यंग्य अपनी जगह हैं। सोशल मीडिया के क्रिएटिव आइडिया भी मन बहलाने के लिए ठीक हैं। लोग हमेशा चाहते हैं कि सूबे की कमान उस नेता के हाथ में हो, जिसे उन्होंने चुनकर भेजा है।  वैसे, लोकतंत्र का भी तो यही तकाजा है।